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हंसराज पहाड़ी शृंखला की तराई से निकलते हैं मोतियों के दाने


Gadwal:

हंसराज पहाड़ी शृंखला की तराई से निकलते हैं मोतियों के दाने

वजीरगंज प्रखंड अंतर्गत हंसराज एवं सोमनाथ पहाड़ी शृंखला एक अद्भुत और ऐतिहासिक स्थल है। इसकी तराई की मैदानी भूमि आज भी मोतियों के दाने उगलते हैं। इसके गर्भ में कीमती पत्थर एवं अष्टधातु की दुर्लभ मूर्तिया हैं। पहाड़ियों पर हरे भरे जंगली औषधीय एवं इमारती पौधे तो हैं ही, पहाड़ी के बीच की चोटी पर एक विशाल शिव मंदिर भी है। इस मंदिर की ऊंचाई कम से कम 50 फीट है। इसके गर्भगृह में चार फीट ऊंचा विशाल शिवलिंग है। इसकी स्थापना कब हुई कोई नहीं बताते पर मंदिर के निर्माण के बारे में सर्वविदित है कि 1944 में सोनपुर के जमींदार शासक निरसू नारायण सिंह ने कराया था।

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं, यह शिवलिंग स्वयं प्रस्फुटित हुआ था। जब राजा नीरशु नारायण अपने शासन काल में क्षेत्र का भ्रमण करते हुए पहाड़ी की चोटी पर गए और उनकी नजर इस विशाल शिवलिंग पर पड़ी थी। तब उन्होंने मंदिर बनवाया। मंदिर निर्माण कराने के बाद हंसराज और सोमनाथ पहाड़ी के बीच लंबे चौड़े विशाल समतल भूभाग का सुंदरीकरण भी कराया। तालाब और कुआं खुदवाए तथा कई फलदार पौधों के साथ औषधीय और इमारती पौधे लगवाए। लोग बताते हैं कि इससे पहले भी इस पर्वत शृंखला के इर्द गिर्द कई राजा महाराजाओं के शासकीय भवन व मूर्ति निर्माण केंद्र होने के कई प्रमाण मिलते हैं। वर्तमान में इस पहाड़ी क्षेत्र की तराई में अवस्थित खेती योग्य उपजाऊ भूमि है। खेतों में जब यहा के किसान हल चलाते हैं या बरसात के मौसम में मूसलाधार बारिश होती है। तब जमीन पर कीमती मोती के दाने बिखर जाते हैं। प्रतीत होता है कि यहा के भूगर्भ में हीरे जवाहरात और मोतियों के भंडार पड़े हैं। खेतों में बिखरे मोतियों को आसपास के ग्रामीण किसान एवं बच्चे चुनकर संग्रह करते हैं। उसे नजदीकी बाजार के जौहरी गाव में आकर ग्रामीणों से संपर्क कर मोतियों के दाने खरीदते हैं। इसकी अच्छी खासी कीमत भी देकर ले जाते हैं। खास बात है कि स्थानीय लोगों को इस मोतियों के कीमत का अंदाजा नहीं, पर इसकी असली कीमत बेचने वालों के व्यक्तित्व और बुद्धिमता पर निर्भर करती है। जौहरी इनके भी मन का भाव समझकर कीमत लगाते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, इसकी कीमत पांच हजार रुपये से लेकर एक लाख तक लगाए जाते हैं। यदि सीधे सादे अशिक्षित महिला के हाथ से वस्तु बेची जा रही है तो जौहरी को काफी मुनाफा होता है। इस पर्वतीय शृंखला की तराई में हसरा, विशनपुर, धरमपुर, कसियाडिह, बलजोरी बिगहा, हरिहरपुर, हेमजा, पतुहला, यमुनापुर, टोटही, रूदई आदि गाव बसे हैं। इन गावों के लोग तराई भाग में अवस्थित खेतों के जोताई या किसी कार्य के लिए किसी दूसरे का सहारा न लेकर स्वयं खोदाई करते हैं। खोदाई के दौरान आज भी जमीन के अंदर से ईट और मोटी-मोटी दीवारों का अवशेष, पौराणिक मिट्टी, कांस्य, पीतल के बर्तन एवं घरेलू सामग्री मिलते हैं। कुछ लोग तो दबी जुबान बताते हैं कि खोदाई के दरम्यान कीमती और आभूषणों से भरे घड़े भी मिले हैं। उसे लोग छुपा लिए, ताकि सरकार या पुरातत्व विभाग ले न जाएं।

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पहाड़ी पर कुआ, तालाब

और आगन जैसा अवशेष

हंसराज पहाड़ी के सटे अधिक ऊंचाई की पहाड़ी है सोमनाथ। इस पर अधिक घने एवं कटीले झाड़ झुरमुट के कारण वर्तमान में हर किसी को चढ़ पाना तो कठिन है, लेकिन जो लोग जोखिम उठाकर चोटी के अंतिम छोर तक पहुंचे हैं। उनके अनुसार इस पहाड़ी पर कुआ, तालाब, चबूतरा एवं आगन जैसा अवशेष दिखाई देते हैं। इस शृंखला में बुद्धकालीन एवं सनातन संस्कृति की अनेक कीमती मूर्तिया भी प्राप्त हुई है, जो काले पत्थर एवं अष्टधातु के होते हैं।

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यहा से प्राप्त महात्मा बुद्ध की मूर्ति पटना के संग्रहालय में सुरक्षित

यहा से प्राप्त महात्मा बुद्ध की एक विशाल मूर्ति पटना के संग्रहालय में सुरक्षित है। इस मूर्ति का पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा अध्ययन किए जाने के बाद 10 वीं शताब्दी का बताया गया है, जो इस मूर्ति के अग्रभाग पर अंकित है। इसी क्षेत्र से प्राप्त दूसरी प्रतिमा भी संग्रहालय में संरक्षित हैं, जो सनातन संस्कृति में भैरव बाबा का बताया जाता है।

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तो मिलेंगे हीरे-जवाहरात

लोग कहते हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि इस पर्वतीय शृंखला के विशुनपुर, धरमपुर के बसावट क्षेत्र में यदि खोदाई कराई जाए तो निश्चित ही ऐतिहासिक धरोहर और कीमती मूर्तिया तथा हीरे मोतियों एवं जवाहरात के भंडार मिल सकते हैं। शृंखला के चारों तरफ कई विशाल और सुंदर तरीके से निर्मित तालाब जो अलग अलग शहरों के नाम से प्रचलित हैं। बताते हैं कि अवश्य ही किसी बड़े शासक का क्षेत्र रहा होगा। पूरब में भव सागर, पश्चिम में कमल सागर, दक्षिण में राम सागर एवं उत्तर में अमर सागर नाम के तालाब अवस्थित हैं।

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पुरातत्ववेत्ताओं की रचनाओं

में इसका वर्णन

इस पहाड़ की तराई में बसे बिशुनपुर गाव के पीएचडी उपाधि प्राप्त डॉ. अमर सिंह सिरमौर जो बौद्ध कालीन यष्टीवन (जेठियन) का ऐतिहासिक विषय पर शोध किए हैं, का कहना है है कि हंसराज एवं सोमनाथ पहाड़ी की शृंखला का वर्णन कई पुरातत्ववेत्ताओं ने अपनी रचना में की है। उनके अनुसार गीता प्रेस से प्रकाशित विष्णु पुराण में इस क्षेत्र का वर्णन तो है ही। भरत सिंह उपाध्याय के बुद्धकालीन भारतीय भूगोल में भी इस शृंखला का वर्णन मिलता है। इसके अलावा इंडियन आर्कियोलॉजी एवं एलेक्जेंडर कनिंघम के बौद्ध स्थलों के खोज सीरीज में भी सोमनाथ पहाड़ी और हंसराज का उल्लेख किया गया है। आधुनिक भारतीय बौद्ध विद्वान प्रोफेसर वि. शि. ला ने भी अपनी रचना में सोमनाथ का जिक्र किया है।

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