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इसराइल के साथ हाथ मिलाने की बारी अब क्या ओमान की है


Gadwal:

मिस्र, जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात के बाद बहरीन मध्य-पूर्व का ऐसा चौथा देश बन गया है जिसका इसराइल के साथ अब राजनयिक संबंध स्थापित हो गया है.

हाल ही में इसराइल और बहरीन अपने संबंधों को पूरी तरह से सामान्य बनाने को लेकर एक ऐतिहासिक समझौते पर सहमत हुए हैं.

इससे पहले गुज़रे अगस्त के महीने में संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल के बीच शांति समझौते की औपचारिक शुरुआत पहली आधिकारिक उड़ान के साथ हुई थी. यह उड़ान इसराइल से संयुक्त अरब अमीरात के लिए भरी गई थी.

संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के साथ हुए इन शांति समझौते के साथ ही अरब देशों और इसराइल के बीच कूटनीतिक संबंधों के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है क्योंकि दशकों से ज़्यादातर अरब देश फ़लस्तीन के मुद्दे और मुस्लिम दुनिया के तीसरे पवित्र शहर पूर्वी यरूशलम (जो स्वतंत्र फ़लस्तीन का हिस्सा होगा) को लेकर इसराइल का बहिष्कार करते रहे हैं.

अरब देशों की इसराइल के सामने ये शर्त रही है कि जब तक वो फ़लस्तीन को अलग राष्ट्र का दर्जा नहीं देते हैं, तब तक वो उनके साथ शांति समझौता नहीं करेंगे. फ़लस्तीनी नेताओं ने अलग फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन के बिना यूएई के इसराइल को मान्यता देने को धोखा भी बताया है.

अरब देशों के साथ इसराइल के ताल्लुक़ात

इन मुद्दों को लेकर 1948 में इसराइल के एक आज़ाद देश के तौर पर अस्तित्व में आने के साथ से ही अरब देशों से ताल्लुक़ शत्रुतापूर्ण रहे हैं. इस साल ही इन नए स्थापित हुए देश के वजूद को मिटाने की कुछ अरब मुल्कों ने नाकाम कोशिश की थी. मिस्र की फ़ौज को पीछे हटना पड़ा था. 1979 में मिस्र ने ही पहली बार इसराइल के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किया था.

इस समझौते की वजह से अरब लीग ने मिस्र की सदस्यता भी रद्द कर दी थी. मिस्र के बाद जॉर्डन 1994 में इसराइल के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला दूसरा देश बना था.

अब संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने भी इसराइल को मान्यता दे दी है और इसके साथ ही मध्य-पूर्व में इसराइल के लिए संभावनाओं के नए रास्ते भी खुल गए हैं. हालांकि, ईरान और तुर्की जैसे देशों ने मध्य-पूर्व के देशों की ओर से इसराइल को मान्यता देने की इस नई शुरुआत पर अपना कड़ा ऐतराज़ जताया है और इसकी निंदा की है.

क्या अब ओमान की बारी है?

मध्य-पूर्व के देशों के रवैये में इसराइल को लेकर आए इन राजनीतिक बदलावों को लेकर जानकारों का कहना है कि ये ईरान की बढ़ती शक्ति, तेल के घटते दाम, खाड़ी के देशों में सरकारों के ख़िलाफ़ विद्रोह का ख़तरा और अमरीकी समर्थन के ख़त्म होने का डर है जिसकी वजह से ये बदलाव देखने को मिल रहे हैं.

संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बाद अब इस बात की संभावना प्रबल होती दिख रही है कि जल्द ही ओमान के साथ भी इसराइल का शांति समझौता हो सकता है और इसके साथ ही इन दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंधों की शुरुआत हो सकती है.

अभी ओमान के साथ इसराइल के अनौपचारिक आदान-प्रदान कुछ साल से जारी हैं. साल 2018 में इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ओमान के दौरे पर भी जा चुके हैं. तब उन्होंने ओमान के तत्कालीन नेता सुल्तान क़ाबूस के साथ मध्य-पूर्व में शांति क़ायम करने को लेकर चर्चा की थी.

हालांकि, ओमान ने अभी इसराइल को मान्यता देने और उसके साथ किसी भी तरह के समझौते की संभावनाओं के बारे में कुछ आधिकारिक तौर पर नहीं कहा है. लेकिन, ओमान ने बहरीन और इसराइल के शांति समझौते का स्वागत किया है और इसे इसराइल और फ़लस्तीन के बीच शांति स्थापित करने में अहम भूमिका निभाने वाला क़दम बताया है. इसके बाद से इसराइल के साथ ओमान के शांति समझौते की अटकलें तेज़ हो गई हैं.

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वेस्ट एशिया सेंटर के प्रोफ़ेसर आफ़ताब कमाल पाशा इस बात की अच्छी संभावना जताते हैं कि ओमान इसराइल के साथ शांति समझौते में जा सकता है.

वो बताते हैं, “ओमान और इसराइल के बीच पुराने संबंध रहे हैं. ओमान खाड़ी का पहला ऐसा देश था जहाँ 1992 में मद्रीद कांफ्रेस के बाद वॉटर रिसर्च पर एक सेंटर खोला गया था. यहाँ पर नियमित तौर पर इसराइलियों का आना-जाना था. इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री राबीन भी यहाँ आए थे. उसके बाद शिमोन पेरेज़ भी आए थे. 2018 में नेतन्याहू ओमान आ ही चुके हैं. इसके अलावा कई मंत्री भी आते रहे हैं. इसलिए ओमान और इसराइल के बीच ताल्लुक़ात पुराने रहे हैं. दूसरी ओर हर बार अमरीका ओमान के साथ इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि आगे आपको इसराइल के साथ मिलकर चलना है.”

ओमान की विदेश नीति

लेकिन, ओमान की अपनी एक विशेष विदेश नीति रही है. ओमान के संबंध ईरान के साथ भी हमेशा से सौहार्दपूर्ण और मधुर रहे हैं. 2018 में नेतन्याहू के मस्कट दौरे के मात्र चार दिन पहले ओमान के विदेश मंत्री के राजनीतिक सहायक मोहम्मद बिन औज़ अल-हस्सान ने तेहरान का दौरा किया था और ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ से मुलाक़ात की थी.

एक ही समय में इसराइली प्रधानमंत्री के स्वागत और मेज़बानी के साथ-साथ ईरान के साथ भी ओमान ने दोस्ताना रिश्ते क़ायम रखे थे. यह ओमान के विदेश नीति की ख़ासियत रही है.

उसने 70 के दशक से अब तक अपने देश के लिए एक अनोखी रणनीति अपनाई है. ऐसा मध्य पूर्व के देशों में कम देखने को मिलता है. मसलन ओमान क्षेत्रीय विवाद में अमूमन तटस्थ रहा है.

इसके अलावा ओमान एक अरब देश है और खाड़ी सहयोग परिषद का सदस्य भी है.

ओमान ने दूसरे देशों के अंदरुनी मामलों में कभी हस्तक्षेप नहीं किया है जबकि हाल के सालों में ऐसी घटनाएं मध्य पूर्व में बहुत बढ़ी हैं, जैसे यमन और सीरिया की स्थिति.

ओमान के सामने उलझन

इस तरह की सामंजस्यपूर्ण विदेश नीति और ईरान के साथ अच्छे संबंध के संदर्भ में ओमान के सामने इसराइल के साथ जाने में क्या उलझन नहीं हो सकती हैं?

प्रोफ़ेसर पाशा इस बारे में कहते हैं, “ईरान के साथ ओमान के पुराने ताल्लुक़ रहे हैं. जब दोफ़ार में विद्रोह हुआ था तब ईरान ने वहाँ अपनी सेना भेजकर उन्हें खदेड़ दिया था. रिवॉल्यूशन के बाद भी ओमान के ईरान के साथ अच्छे रिश्ते रहे हैं और मिस्र ने जब पहली बार इसराइल के साथ 1979 में शांति समझौता किया था तब ओमान अकेला ऐसा देश था जिसने इसका खुलकर स्वागत किया था.

तो ओमान कमोबेश एक बैलेंस नीति अख़्तियार करता रहा है ईरान, तुर्की, इसराइल और यहाँ तक कि इराक़ पर भी. जब खाड़ी देशों ने सद्दाम से रिश्ता तोड़ लिया था तब उस वक़्त भी ओमान ने ऐसा करने से मना कर दिया था. ये सुल्तान क़ाबूस की विदेश नीति की एक ख़ूबी थी. लेकिन नए सुल्तान के रुख़ के बार में अभी उतनी स्पष्टता सामने नहीं आई है.”

वो आगे कहते हैं, “लेकिन जिस तरह से नए सुल्तान हैयथम बिन तारिक़ अल-सईद ने विदेश मंत्री को हटाया है उससे लगता है कि वो इसराइल को लेकर कोई जल्दबाज़ी नहीं करना चाहते. हालांकि, ओमान सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच कोई बहुत अच्छे ताल्लुक़ नहीं है. संयुक्त अरब अमीरात अंदरुनी हस्तक्षेप कर ओमान में सुल्तान क़ाबूस का तख़्तापलट करना चाहता था.”

“इसलिए वो बहुत नाराज़ थे. यमन के मामले को लेकर भी सुल्तान क़ाबूस इन दोनों देशों से नाराज़ थे. क्योंकि यमन की जंग से शरणार्थियों की समस्या के रूप में ओमान को काफ़ी परेशानी झेलनी पड़ी थी. इसलिए अब नए सुल्तान पुरानी नीति पर ही चलते हैं या स्वतंत्र नीति अपनाते हैं ये देखने वाली बात होगी.”

इसराइल के साथ जाने के ओमान के सामने ख़तरे

प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि ओमान के सामने अभी दो ख़तरे हैं जिसका ख्याल उनको होगा.

वो बताते हैं, “पहला ख़तरा है दोफार में जिस विद्रोह को कुचल दिया गया था, वो अभी भी सक्रिय है. दोफार ओमान का सबसे बड़ा प्रांत है. उसे दो हिस्से में बाँट दिया गया है. इससे स्थानीय लोगों में यह शिकायत आ गई है कि वहाँ का तेल और गैस उनके लोगों को छोड़कर दूसरे प्रांत के लोगों को दिया जा रहा है. यमन चूंकि हूती और दक्षिण यमन में बँट गया है और दक्षिणी यमन के साथ दोफार के अच्छे रिश्ते हैं. एक ही क़बीले के लोग भी हैं.

अगर यहाँ किसी भी तरह से हालात बिगड़ते हैं तो इसका सीधा असर ओमान पर होगा. दूसरी ओर जो चिंता की बात है, वो यह है कि ओमान शायद ईरान को नाराज़ ना करना चाहे. ओमान अपनी सुरक्षा के लिए ज़रूर अमरीका पर निर्भर है लेकिन अब धीरे-धीरे अमरीका भी इस क्षेत्र से इसराइल को आगे बढ़ाकर ख़ुद हटना चाहता है. ओमान को इस बात की भी आशंका है. ऐसी स्थिति में ओमान को ईरान के साथ की ज़रूरत पड़ेगी.”

निश्चित तौर पर ओमान इसराइल के साथ किसी भी तरह के समझौते में जाने से पहले अपनी इन आशंकाओं को ध्यान में रखना चाहेगा. शायद तभी इसराइल के साथ दूसरे अरब देशों की तुलना में संतुलित विदेश नीति अपनाने के बावजूद उसने अब तक इसराइल की तरफ़ समझौते का हाथ नहीं बढ़ाया है.















BBC

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